फाइन आर्ट सेंटर ने एक दिवसीय वर्कशॉप कायाकल्प का आयोजन किया

स्त्री श्रृंगार में लगाए जाने वाले महावर, मेहंदी ,सिंदूर-बिंदी सब इसी के अंर्तगत आते हैं

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आजमगढ़ । नवरात्रि के अवसर पर फाइन आर्ट सेंटर के कलाकारों ने सरस्वती, दुर्गा, काली, शिव,अर्धनारीश्वर व शेर को पेंटिंग से सजीव रूप दिया। माथे व शरीर मे की गई पेंटिंग में हल्दी, कुमकुम, आलता व रंगों का इस्तेमाल किया गया। मॉडल के रूप में बाल कलाकार काश्वी को कृष्णा व मुस्कान ने सरस्वती का रूप दिया। नन्दिनी व श्रिया ने मानवी को दुर्गा का रूप दिया। वैष्णवी को अपनी कला से श्रद्धा व प्रिया ने मां काली का सजीव रूप दिया। आशिनी को कैलासवासी शिव के रूप नील वर्ण में तैयार किया ईशा व साक्षी ने। अर्धनारीश्वर रूप में मिश्का को किंशुक व श्रुति ने तैयार किया व माता रानी की सवारी सिंह के रूप में अनन्त को नेहा व दीपिका ने तैयार किया। बाल कलाकार श्लोका को बंगाली बाला का रूप देकर सुनीता व अनीता ने सभी की आराधना के लिए तैयार किया।

निदेशक डॉ. लीना ने बताया कि सांस्कृतिक धरोहर को सहेजती कलाओं में काया चित्रकारी प्रागेतिहासिक काल से चली आ रही है। प्राचीन काल से प्रचलित गोदना कला इसी का एक उदाहरण है जो आज के समय मे टैटू के रूप में प्रचलित है। स्त्री श्रृंगार में लगाए जाने वाले महावर, मेहंदी ,सिंदूर-बिंदी सब इसी के अंर्तगत आते हैं। रामलीला, रंगमंच व सिनेमा के कथानक की सफलता में कलाकरों के चेहरे में चित्रकारी की महत्वपूर्ण भूमिका सर्वविदित है। विलुप्त होती प्राचीन कलाओं खासकर लोककलाओं के संरक्षण के लिए इस कार्यशाला में कलाकारों को बॉडी पेंट आर्ट का निशुल्क प्रशिक्षण दिया गया।

एक दिवसीय वर्कशॉप कायाकल्प को कराने का एक उद्देश्य प्राचीन कला को आधुनिक रूप में प्रस्तुत करना है। साथ ही यह बताना कि यह कला फैंसी ड्रेस से कितनी भिन्न है और शरीर पर रंगों से व्यक्ति चित्रण कर इसे नई पीढ़ी को रोचक रूप में अवगत कराना था।

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