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नीतीश के साथ रिश्तो में खटास के बाद सियासी सफर में लगा ब्रेक

बिहार: नीतीश कुमार जिसे चाहे उसे उठा सकते हैं और जिसे जब चाहे उसे गिरा भी सकते हैं। यही कारण है कि नीतीश के लिए यह बात बढ़-चढ़कर कही जाती है कि बिहार की सियासत में उनको नजरअंदाज करना सही नहीं है। नीतीश कुमार फिलहाल बिहार के मुख्यमंत्री हैं। भाजपा के साथ उनकी पार्टी जदयू का गठबंधन है। 2020 तक बिहार में जदयू हमेशा बड़े भाई की भूमिका में रही। लेकिन 2020 के बाद यह समीकरण बदला और जदयू छोटे भाई की भूमिका में आ गई। हालांकि, चुनाव बाद जदयू के लिए परिस्थितियां लगातार बनती-बिगड़ती रही। 2019 में एनडीए में रहने के बावजूद भी नीतीश कुमार ने मोदी मंत्रिमंडल में सांकेतिक भागीदारी से साफ तौर पर इंकार कर दिया था। हालांकि, 2021 में मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान पार्टी अध्यक्ष आरसीपी सिंह खुद मंत्री बन गए और मोदी मंत्रिमंडल में जदयू का प्रतिनिधित्व भी करने लगे।

रिश्तो में खटास 

यहीं से नीतीश और आरसीपी सिंह के रिश्तो में खटास की शुरुआत हो गई। आरसीपी सिंह नीतीश कुमार के लिए हमेशा दाहिने हाथ माने जाते रहे हैं। नीतीश कुमार जब रेल मंत्री थे तब दोनों की मुलाकात हुई थी। उसके बाद आरसीपी सिंह लगातार उनके साथ बने रहे। नीतीश कुमार जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तो आरसीपी सिंह भी बिहार पहुंच गए। आरसीपी सिंह ब्यूरोक्रेट से इस्तीफा देने के बाद 2010 में राज्यसभा पहुंचे। 2016 में उन्हें दोबारा जदयू की ओर से राज्यसभा भेजा गया। जब प्रशांत किशोर जदयू में शामिल हुए तो आरसीपी सिंह थोड़े दरकिनार किए जाने लगे। हालांकि शांत रहकर आरसीपी सिंह ने नीतीश के समक्ष अपनी स्थिति को फिर से मजबूत किया। आरसीपी सिंह हमेशा नीतीश कुमार के बेहद भरोसेमंद रहे हैं। यही कारण है कि नीतीश कुमार जब जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटे तो आरसीपी सिंह को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई।

मंत्री पद से इस्तीफा

आरसीपी सिंह उसके बाद लगातार जदयू के संगठन को मजबूत करने की कोशिश करते रहे। उन्हें नीतीश का पूरा सहयोग मिलता रहा। हालांकि 2021 के बाद लगातार दोनों के रिश्तो में दूरियां दिखाई देने लगी। आरसीपी सिंह के केंद्रीय मंत्री बनने के साथ ही जदयू की कमान ललन सिंह ने संभाली। इसके बाद आरसीपी सिंह की स्थिति नीतीश कुमार की नजर में थोड़ी कमजोर हुई और ललन सिंह लगातार मजबूत होते चले गए। ललन सिंह और आरसीपी सिंह के रिश्ते कभी सहज नहीं रहे। लेकिन यह बात भी सही है कि दोनों नीतीश कुमार के इशारों पर ही काम करते रहे हैं। आरसीपी सिंह का राज्यसभा का कार्यकाल 7 जुलाई को समाप्त हो रहा था। मंत्री बने रहने के लिए उन्हें दोनों सदनों में से किसी एक सदन का सदस्य होना जरूरी था। जदयू की ओर से उन्हें दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा गया जिसके बाद उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

आगे क्या है विकल्प

अब सवाल यह है कि कभी जदयू में नंबर दो की हैसियत रखने वाले आरसीपी सिंह के लिए आगे क्या विकल्प है? सबसे पहला विकल्प उनके पास यही है कि वह पार्टी में बने रहें और नीतीश कुमार का विश्वास जीतने की कोशिश करते रहे। दूसरे विकल्प की बात करें तो वह पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल हो सकते हैं। वर्तमान में भाजपा उनके लिए बढ़िया विकल्प भी है। लेकिन भाजपा फिलहाल आरसीपी सिंह को पार्टी में शामिल करने से बचेगी क्योंकि नीतीश के साथ उसके रिश्तो पर असर पड़ सकता है।