Thursday , June 30 2022

राज्यसभा चुनाव को लेकर बढ़ी बसपा सुप्रीमो मायावती की मुश्किलें, इनसे बढ़ गई दूरियां

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में होने वाले उपचुनाव को लेकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुश्किलें कम होने का नाम ही नही ले रही हैं। हाल ही में बसपा के 7 विधायकों ने पार्टी से बगावत करते हुए समाजवादी पार्टी में शामिल होने का निर्णय किया। जिसके बाद मायावती ने बागी विधयाकों को पार्टी से निष्काषित कर दिया। विधान परिषद चुनाव में समाजवादी पार्टी को सबक सिखाने की सौगंध के साथ भारतीय जनता पार्टी के प्रति जो नरम रुख बसपा मुखिया ने दिखाया है, उसके हानिकारक परिणाम आंके जा रहे हैं और अब तक उनके साथ कड़ा मुस्लिम मतों का एक वर्ग उनसे बिदक सकता है। यही नहीं, भाजपा के जो असतुष्ट अपने लिए बसपा में संभावनाएं देख रहे थे, वह भी दूरी बना लेंगें। एसी स्थिति में मायावती के लिए अपना कुनबा बढ़ाना तो दूर, सिमटते जा रहे साम्राज्य को संभालने की भी चुनौती होगी।

अखिलेश को हराने के लिए भाजपा का देंगी साथ

अब तक तो विरोधी ही मायावती पर भाजपा से साठ-गांठ का आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन गुरुवार को बसपा सुप्रीमो ने खुद ही सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर तीखे प्रहार करते हुए उन्हें सबक सिखाने के लिए भाजपा का साथ देने तक का एलान कर दिया। इससे सूबे का सियासी माहौल एकदम से गरमा गया है। हालात इशारा कर रहे हैं कि इंतकाम की ये कहानी अगले डेढ़ बरस यानी विधानसभा चुनाव तक चलती रहेगी। फिलहाल तो नुकसान नीले खेमे में ही नजर आ रहा है।

मुस्लिम समुदाय के निशाने पर मायावती

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसा कहा जाता है कि मुस्लिम उसके साथ जाता रहा है, जो भाजपा को हराने की स्थिति में हो। मुस्लिम मतों को लुभाने के लिए खुद को उनका सच्चा हितैषी बताते हुए मायावती भी पूर्व में न केवल उन्हें ज्यादा टिकट देती रहीं हैं, बल्कि भाजपा से साठ-गांठ के आरोपों को भी सिरे से खारिज करती रहीं। लेकिन, अब वे अपने दिए बयान की वजह से सीधे तौर पर मुस्लिम समाज के निशाने पर होंगी। बसपा से बगावत करने वाले विधायक असलम अली कहते हैं कि हम लोग तो भाजपा के खिलाफ ही लड़कर आए हैं, लेकिन अब पार्टी ही भाजपा के साथ जा रही है।

सपा को मिलेगा फायदा

पूरे प्रकरण में ध्यान देने वाली बात यह भी है कि सत्ताधारी भाजपा से असंतुष्ट नेताओं का रुख भी अब बसपा के बजाए सपा व अन्य पार्टियों की तरफ होगा। चूंकि कांग्रेस व आम आदमी पार्टी को अभी सूबे में पैर जमाने के लिए खुद ही बहुत मेहनत करनी है, इसलिए असंतुष्टों की पहली पसंद सपा ही बनती दिख रही है। जिन सीटों पर भाजपा के विधायक हैं और वहां पिछले चुनाव में बसपा दूसरे स्थान पर रही है, वहां से चुनाव लड़ने वाले खास तौर से सपा का दामन थामने को तैयार दिख रहे हैं।

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