लॉकडाउन के बाद बिजली की मांग 12 फीसदी बढ़ी , 59.80 मेट्रिक टन कोयला किया डिस्पेच

एक दिन में बिजली की सबसे अधिक आपूर्ति 200.57 गीगावॉट रही

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देश में कोयले की कमी के कारण बिजली का संकट लगातार बढता नजर आ रहा है वहीं सरकार लगातार कोयले की आपूर्ति में सुधार की बात कर रही है। सरकार की तरफ से कहा गया है कि पहले के मुकाबले इस बार न केवल उत्पातदन बढ़ा है बल्कि आपूर्ति भी बढ़ाई गई है। सरकार का ये भी कहना है कि अर्थव्यीवस्था में आई तेजी की वजह से बिजली की मांग बढ़ी है। इसको देखते हुए बिजली संयंत्रों ने पहले ही अपेक्षा कहीं अधिक बिजली यूनिट का उत्पाजदन किया है। बिजली उत्पादन का अधिकांश हिस्सा (60 फीसदी से अधिक) कोयला और भूरा कोयला (लिग्नाइट) से पैदा होता है, जबकि जल विद्युत परियोजनाओं से लगभग 22 फीसदी ही बिजली का उत्पादन होता है.लॉकडाउन और मानसून में देरी की वजह से देश में बिजली की खपत जुलाई में करीब 12 फीसदी बढ़कर 125.51 अरब यूनिट पर पहुंच गई कोयला मंत्रालय की मंथली रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर 2021 में 51.70 मैट्रिक टन कोयले का उत्पाटदन किया गया था, जबकि इसी अवधि में साल 2019 में ये उत्पाबदन 39.48 टन था और इसी अवधि में साल 2020 में ये 38.90 मेट्रिक टन था। आंकड़ों के मुताबिक सितंबर 2021 में 59.80 मेट्रिक टन कोयला डिस्पेेच किया गया था, जो कि इसी अवधि में साल 2019 और 2020 की तुलना में कहीं ज्यादा था।

बिजली मंत्रालय के आंकड़ों से यह जानकारी मिली है कि जुलाई, 2020 में बिजली की खपत 112.14 अरब यूनिट रही थी. यह महामारी से पहले यानी जुलाई, 2019 के 116.48 अरब यूनिट के आंकड़े से थोड़ा ही कम है जबकि सात जुलाई, 2021 में बिजली की सबसे अधिक आपूर्ति 200.57 गीगावॉट की रही. इसके अलावा रोजाना होने वाली बिजली की खपत भी सात जुलाई को बढ़कर सर्वकालिक उच्चस्तर 450.8 करोड़ यूनिट पर पहुंच गई. जुलाई, 2020 के पूरे महीने में व्यस्त समय की पूरी की गई बिजली की मांग 170.40 गीगावॉट थी. इस तरह जुलाई, 2021 में व्यस्त समय की पूरी की गई बिजली की मांग करीब 18 फीसदी ज्यदा रही. दो जुलाई, 2020 को व्यस्त समय में बिजली की मांग 170.40 गीगावॉट दर्ज की गई थी वहीं जुलाई, 2019 में व्यस्त समय की पूरी की गई बिजली की मांग 175.12 गीगावॉट रही थी आपको बता दे कि भारत में 1,70,000 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है. जब 1947 में देश आजाद हुआ था, उस समय सिर्फ 1362 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता था. भारत में स्वतंत्रता के समय से ही बिजली की भयंकर कमी रही है जबकि इसके उत्पादन में आठ फीसदी की दर से बढ़ोतरी होती रही है. योजना आयोग के अनुसार पीक समय में बिजली की कमी दस फीसदी होती है जबकि समान्यतया 7 फीसदी बिजली की कमी होती है. वहीं वर्ष 1995-96 में 22 फीसदी नुक्सान हुआ था जबकि 2009-10 में यह बढ़कर 25.6 फीसदी हो गया. आजादी के 65 साल बाद भी सरकारी तौर पर 30 राज्यों में से सिर्फ नौ राज्यों- आंध्र प्रदेश, गोवा, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, केरल, पंजाब, कर्नाटक और तमिलनाडु में ही पूरी तरह विद्युतीकरण हो पाया है. भारत का सबसे पहला बिजली उत्पादन कंपनी निजी क्षेत्र का था. उस कंपनी का नाम कलकत्ता इलेक्ट्रिक सप्लाई कॉरपोरेशन (सीईएससी) था. वह 1899 में शुरु हुआ था. डीजल से पहली बार बिजली का उत्पादन दिल्ली में 1905 में शुरू हुआ था. इसी तरह मैसूर में 1902 में जल विद्युत उत्पादन केन्द्र बना था. आजादी के समय देश में 60 फीसदी बिजली उत्पादन का काम निजी कंपनियों के हाथ में था जबकि आज लगभग 80 फीसदी बिजली का उत्पादन सरकारी क्षेत्र के हाथों में है और सिर्फ 12 फीसदी बिजली निजी कंपनियों के हाथ में है. लगातार बिजली की मांग होने के बावजूद भी भारत में प्रति व्यक्ति सबसे कम बिजली की खपत होती है. पूरी दुनिया में औसतन बिजली की खपत 2429 यूनिट है जबकि भारत में यह 734 यूनिट है. आप कह सकते हैं कि भारत में बिजली की खपत नहीं के बराबर है. वहीं कनाडा में बिजली की खपत सबसे ज्यादा 18, 347 यूनिट है जबकि अमरीका में यह 13,647 यूनिट और चीन में 2456 यूनिट है. भारत में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत इतना कम है जबकि हर साल उसकी मांग में सात फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है

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