यूपीपीसीएल के पूर्व एमडी एपी मिश्रा को मिली जमानत

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लखनऊ। पीएफ घोटाले में फंसे यूपी पावर कॉरपोरेशन (यूपीपीसीएल)के पूर्व एमडी एपी मिश्रा को शनिवार को जमानत मिल गई। एपी मिश्रा पिछले करीब दो साल से पीएफ घोटाले में मुख्य आरोपी के तौर पर जेल में बंद थे। हालांकि, एपी मिश्रा को सीबीआई कोर्ट में अपना पासपोर्ट सरेंडर करना होगा। कई बार मिश्रा की जमानत खारिज भी हो चुकी थी। सपा सरकार के सबसे नजदीकी टेक्नोक्रेट में शामिल एपी मिश्रा करीब पांच साल तक एमडी के पद पर तैनात थे। उस दौरान उनका रसूख ऐसा था कि पावर कॉरपोरेशन के एमडी के साथ उनको मध्यांचल और पूर्वांचल एमडी का पदभार भी मिला हुआ था। वह मुलायम और अखिलेश दोनों के करीबी थे।

नवंबर 2019 में यह घोटाला उजागर हुआ था। बिजली कर्मचारियों के भविष्य निधि के 2,268 करोड़ रुपए बिजली विभाग ने जिस डीएचएफएल में लगाया था। इसकी जांच ईडी समेत कई एजेंसियां कर रही थी। एपी मिश्रा के बाद कोई भी इंजीनियर एमडी नहीं बन पाया है।
बता दें कि हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से मिश्रा को जमानत मिली है। इससे पहले एपी मिश्रा ने पिछले साल मई में जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, एपी मिश्रा की गिरफ्तारी यूपी पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) ने नवंबर 2019 में ही एपी मिश्रा को गिरफ्तार किया था।
क्या है मामला?
यूपीपीसीएल के हजारों कर्मचारियों के भविष्य निधि का करोड़ों रुपए बैंक से निकालकर खस्ताहाल कंपनी डीएफएचएल में निवेश कर दिया गया था। योगी सरकार ने इस घोटाले की जांच के लिए पहले एसआईटी गठित की थी। बाद में, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपने का फैसला किया था। सीबीआई ने 2020 में 4323 करोड़ रुपए के इस घोटाले में अपनी जांच शुरू की और यूपीपीसीएल के पूर्व एमडी अयोध्या प्रसाद मिश्रा को गिरफ्तार कर लिया गया था। इस मामले में तत्कालीन वित्त निदेशक सुधांशु द्विवेदी, ट्रस्ट सचिव पीके गुप्ता और पूर्व एमडी एपी मिश्र को भी गिरफ्तार किया गया था।

21 अप्रैल, 2014 को उत्तर प्रदेश स्टेट पावर सेक्टर एम्पलाइज ट्रस्ट के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की बैठक में कर्मचारियों के जीपीएफ और सीपीएफ का पैसा ज्यादा ब्याज देने वाले फाइनेंशियल कॉरपोरेशन में लगाने का फैसला हुआ है। उस समय एमडी एपी मिश्रा थे। इसके बाद मार्च, 2017 से लेकर दिसंबर, 2018 तक तत्कालीन सचिव, ट्रस्ट पीके गुप्ता और निदेशक वित्त सुधांशु द्विवेदी की मंजूरी पर दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन (डीएचएफएल) में निवेश किया जाता रहा। जबकि इन दोनों अधिकारियों को पता था कि डीएचएफएल वाणिज्यिक बैंक की श्रेणी में नहीं आता है। इसमें एपी मिश्रा भी दोषी पाए गए थे।

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