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बड़ी-छोटी कंपनियों पर कैसे करें भरोसा, जानें एक्सपर्ट की राय

नई दिल्ली:- आजकल सब कुछ आनलाइन है। एक समय था जब बच्चे, टीचर के हाथ से लिखे रिपोर्ट कार्ड घर ले जाते थे और अपने मां-बाप से साइन करवाते थे। जो बच्चा अपने नंबरों को लेकर ज्यादा घबराता था, उसके लिए रिपोर्ट कार्ड में फेरबदल करने के दो मौके होते थे। वो या तो रिपोर्ट कार्ड के नंबरों में बदलाव कर दे, या मां-बाप के नकली साइन करे। कई बच्चों को इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं होती थी कि रिपोर्ट कार्ड में नंबरों का असल मायने क्या है। उन्हें सिर्फ इस बात की फिक्र रहती थी कि पेपर पर एक अच्छा एकेडमिक रिकार्ड कैसे बरकरार रहे।
यही बात कई लिस्टेड कंपनियों पर लागू होती है। ऐसी कंपनियों के प्रमोटर उन बच्चों जैसे होते हैं, जिनके आडिटर किसी टीचर का रोल अदा करते हैं, और एनालिस्ट व इन्वेस्टर अभिभावक के रोल में होते हैं। इन कंपनियों का लक्ष्य सच बताना नहीं बल्कि वो भ्रम बनाना होता है, जो निवेशकों के लिए खड़ा किया जाता है। दरअसल, इनके प्रमोटरों के लक्ष्य अलग होते हैं और वो आम शेयरधारक के लक्ष्य से मेल नहीं खाते
पिछले कुछ दशकों में ऐसी कंपनियों की कई गलत मिसाल सामने आई हैं, जिनका खड़ा किया भ्रम निवेशकों के सिर पर मुसीबत बन कर फूटा। मगर हां, ये सिर्फ वो बड़ी घटनाएं हैं, जो लोगों की नजर में आ पाईं। इस तरह की सबसे बड़ी घटना सत्यम रही। मगर सत्यम दो तरह से अलग था। पहला, कंपनी का साइज और एक बढ़ती हुई इंडस्ट्री में उसका अहम रोल। दूसरा, किस तरह से रामलिंग राजू ने अंत तक इस भ्रम को बनाए रखा। असल में इस फ्राड का इतना लंबा खिंचना असल अचरज की बात रही। और ये तभी संभव हो पाया जब इसमें आडिट करने वालों ने एक रोल निभाया। सत्यम की घटना बाद में होने वाले आडिट सुधारों की बड़ी वजह बनी।

सत्यम सिर्फ एक मिसाल है। ऐसी बहुत सी कंपनियां हैं जिनमें पिछले कुछ दशकों में इस तरह के खुलासे हुए हैं। आइएलएफएस, काक्स एंड किंग्स, डीएचएफएल और सीजी पावर कुछ नाम हैं, जो तुरंत ही दिमाग में आते हैं। इनमें से ज्यादातर घटनाओं में चेतावनी के संकेत पहले से और लंबे समय से नजर आ रहे थे। आज की तुलना में, पहले चीजें काफी अलग हुआ करती थीं। इक्विटी निवेश के मूल में जानकारी और नंबरों का वो भरोसा है, जो कंपनियां अपने बिजनेस के बारे में निवेशकों के लिए रिलीज करती हैं। इस भरोसे के बिना कुछ भी नहीं है। ऐतिहासिक तौर पर, कम-से-कम 90 के दशक के अंत तक, ऐसे नंबरों पर भरोसा करना काफी मुश्किल था। असल में, तब स्टाक के दामों में एक ट्रस्ट प्रीमियम या डिस्काउंट हुआ करता था। मिसाल के तौर पर, एक एमएनसी प्रीमियम होता था, जो कमोबेश इसलिए था कि आप उनके नंबरों पर भरोसा कर सकते थे।

आज, इक्विटी मार्केट में स्थिति काफी बदल गई है। कम-से-कम सबसे बड़ी 100 से 200 कंपनियों के नंबरों पर आप भरोसा कर सकते हैं। कई तरह के रेग्युलेटरी सुधारों ने भी इसमें भूमिका निभाई है। इनमें आडिटिंग को लेकर किए गए सुधार भी शामिल हैं। इससे भी बढ़कर, एक खास साइज से बड़ी कंपनियों पर बहुत सारे निवेशकों और एनालिस्ट का ध्यान होने से, किसी तरह की गड़बड़ी को आसानी से पहचाना जा सकता है। अगर आप अपनी रिसर्च खुद कर रहे हैं और छोटी कंपनियों में निवेश कर रहे हैं, तब आपको अपना खयाल खुद रखना आना चाहिए।

निवेश को लेकर हमेशा सही रवैया रखना और निवेश में पारंगत हो जाना आसान नहीं होता। पर आज, इसके लिए काफी मदद आनलाइन मिल जाती है। संभावित धोखाधड़ी पकड़ना या ऐसे खतरे को भांपना जो संदेहास्पद हो, हर निवेशक की टूलकिट का अहम हिस्सा होता है। इक्विटी निवेशक अपने स्वभाव से आशावादी होता है और मानता है कि अंत में सब कुछ ठीक हो जाएगा।