91 वर्ष की उम्र में महान एथलीट मिल्खा सिंह का निधन

रेसिंग ट्रैक के फ्लाइंग सिख को अंतिम सलाम

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-5 दिन पहले हुई मिल्खा सिंह की पत्नी का निधन –
-पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने दी थी फ्लाइंग सिख की उपाधि
-मिल्खा सिंह ने अर्जुन अवॉर्ड लेने से मना कर दिया था
-प्रधानमंत्री मोदी ने भावुक संदेश से दी श्रद्धांजलि

चंडीगढ़। भारत के ‘फ्लाइंग सिख’ के नाम से विश्व विख्यात महान फर्राटा धावक मिल्खा सिंह का एक महीने तक कोरोना संक्रमण से जूझने के बाद शुक्रवार देर रात करीब साढ़े 11 बजे चंडीगढ़ पीजीआई में निधन हो गया। इससे पहले रविवार को उनकी 85 वर्षीया पत्नी और भारतीय वॉलीबॉल टीम की पूर्व कप्तान निर्मल कौर ने भी कोरोना संक्रमण के कारण दम तोड़ दिया था। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत राजनेताओं, खेल और सामाजिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने शोक जताया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के महान धावक मिल्खा सिंह के निधन पर शोक जताते हुए कहा कि भारत ने ऐसा महान खिलाड़ी खो दिया, जिनके जीवन से उदीयमान खिलाड़ियों को प्रेरणा मिलती रहेगी। मोदी ने ट्वीट किया, ‘मिल्खा सिंह जी के निधन से हमने एक महान खिलाड़ी को खो दिया, जिनका असंख्य भारतीयों के हृदय में विशेष स्थान था। अपने प्रेरक व्यक्तित्व से वे लाखों के चहेते थे। मैं उनके निधन से आहत हूं। उन्होंने आगे लिखा, मैने कुछ दिन पहले ही मिल्खा सिंह जी से बात की थी। मुझे नहीं पता था कि यह हमारी आखिरी बात होगी। उनके परिवार और दुनिया भर में उनके प्रशंसकों को मेरी संवेदनाएं।
कई रिकॉर्ड बनाने वाले मिल्खा सिंह 91 साल की उम्र में इस दुनिया से कूच कर गए। 90 साल की उम्र के बाद भी उनका फिटनेस के प्रति जुनून कम नहीं हुआ था। शुक्रवार देर रात चंडीगढ़ पीजीआई के प्रवक्ता प्रो. अशोक कुमार ने बताया कि डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की तमाम कोशिशें की वह शुरुआत में रिकवर भी कर रहे थे, लेकिन वीरवार रात को मिल्खा सिंह का ऑक्सीजन स्तर गिर गया और उन्हें बुखार भी आ गया था। उन्हें सांस लेने में लगातार दिक्कत हो रही थी। मिल्खा सिंह के इलाज में लगी सीनियर डॉक्टरों की टीम के साथ उनकी बेटी मोना भी शामिल थीं। परिवार ने उन्हें वेंटिलेटर लगाने के लिए मना कर दिया था, परिवार का मानना था कि वह काफी कमजोर हो चुके हैं और इससे उनकी तकलीफ और बढ़ेगी। बता दें बुधवार को उनकी कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव आ गई थी, जिसके बाद उन्हें कोविड अस्पताल के कार्डियक आईसीयू में शिफ्ट कर कर दिया था। वहीं उनका इलाज चल रहा था। वह तेजी से रिकवर कर रहे थे, लेकिन उम्र और शारीरिक कमजोरी की वजह से वह जिंदगी की जंग हार गए। उनके निधन से पूरे खेल जगत में शोक लहर है।
गौरतलब है कि मिल्खा सिंह की 17 मई को कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में भर्ती करवाया गया था, जहां कोरोना की रिपोर्ट नेगेटिव आने के बाद 31 मई को उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी। इसके बाद वह सेक्टर -8 स्थित अपने घर में कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए आराम कर रहे थे। तीन जून को अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई और ऑक्सीजन लेवल गिरने के बाद उन्हें पीजीआई में भर्ती करवाया गया था। इससे पहले 13 जून को उनकी पत्नी निर्मल मिल्खा सिंह का कोरोना महामारी से निधन हो गया था।
मिल्खा सिंह को पद्मश्री सम्मान से नवाजा जा चुका है। ऐसे में मिल्खा सिंह और उनके बेटे जीव मिल्खा सिंह देश के ऐसे इकलौते पिता-पुत्र की जोड़ी है, जिन्हें खेल उपलब्धियों के लिए पद्मश्री मिला है।

अर्जुन अवॉर्ड लेने से किया था मना
मिल्खा सिंह का जन्म 20 नवंबर 1929 को गोविंदपुरा (जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है) के एक सिख परिवार में हुआ था। उन्हें खेल और देश से बहुत लगाव था, इस वजह से वे विभाजन के बाद भारत आ गए और भारतीय सेना में शामिल हो गए। मिल्खा सिंह को 1959 में पद्मश्री अवॉर्ड दिया गया था। 2001 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड दिए जाने की घोषणा की गई थी, लेकिन उन्होंने इसे लेने से इंकार कर दिया था। बाद में उन्होंने इसकी वजह बताते हुए कहा था कि आजकल अवॉर्ड मंदिर में प्रसाद की तरह बांटे जाते हैं। मुझे पद्मश्री अवॉर्ड के बाद अर्जुन अवॉर्ड के लिए चुना गया।

पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने दिया था फ्लाइंग सिख का नाम
पांच बार के एशियन गेम्स गोल्ड मेडलिस्ट मिल्खा सिंह को पहली बार 1960 में फ्लाइंग सिख कहा गया था। यह उपनाम उन्हें पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने दिया था। 1960 में अयूब खान ने इंडो-पाक स्पोर्ट्स मीट के लिए मिल्खा सिंह को पाकिस्तान आमंत्रित किया था। मिल्खा सिंह बचपन में जिस देश को छोड़ आए थे वहां वे नहीं जाना चाहते थे। लेकिन, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जोर देने पर वे भारतीय दल के लीडर के तौर पर पाकिस्तान गए।
मिल्खा ने 200 मीटर स्प्रिंट में पाकिस्तान के सुपर स्टार अब्दुल खलीक को आसानी से हराकर गोल्ड मेडल जीता। मेडल सेरेमनी में अयूब खान ने मिल्खा सिंह को पहली बार फ्लाइंग सिख कहा।

मिल्खा ने बताई थी अपनी ख्वाहिश
2018 में 4 मार्च को पंजाब यूनिवर्सिटी में होने वाले 67 वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में उड़न सिख मिल्खा सिंह को खेल रत्न अवार्ड से सम्मानित किया गया था। उपराष्ट्रपति और पंजाब यूनिवर्सिटी के चांसलर एम वेंकैया नायडू के हाथों उन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ। अवार्ड मिलने के बाद मिल्खा ने कहा था कि वे चाहते हैं कि उनके मरने से पहले कोई ओलंपिक मेडल जीत कर ले आए। मिल्खा सिंह 1960 के रोम ओलिंपिक में 400 मीटर दौड़ में चौथे स्थान पर रहे थे। हालांकि, वह मेडल जीतने में सफल नहीं हुए, लेकिन 45.43 सेकेंड का समय निकाला था, जो नेशनल रिकॉर्ड था। यह रिकॉर्ड 40 साल तक रहा। मिल्खा ने 1962 जकार्ता एशियन गेम्स में लगातार दो गोल्ड मेडल जीते थे। उन्होंने 400 मीटर और 400 मीटर रिले रेस में गोल्ड जीता था। इससे पहले 1958 एशियन गेम्स में 200 और 400 मीटर में गोल्ड मेडल जीते थे। मिल्खा ने 1958 कॉमनवेल्थ गेम्स में ट्रैक एंड फील्ड इवेंट में भारत के लिए पहला गोल्ड जीता था। 56 साल तक यह रिकॉर्ड कोई नहीं तोड़ सका। 2010 में कृष्णा पूनिया ने 2010 डिस्कस थ्रो में गोल्ड मेडल हासिल किया था।

संघर्ष पर बन चुकी है फिल्म
महान धावक मिल्खा सिंह के जीवन पर भाग मिल्खा भाग नाम से फिल्म भी बनी है। मिल्खा सिंह ने कभी भी हार नहीं मानी। हालांकि मिल्खा सिंह ने कहा था कि फिल्म में उनकी संघर्ष की कहानी उतनी नहीं दिखाई गई है जितनी कि उन्होंने झेली है। मिल्खा सिंह ने अपने जीवन पर बनी फिल्म भाग मिल्खा भाग के डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा से केवल एक रुपया लिया था। भाग मिल्खा भाग नाम की इस बायोपिक में फरहान अख्तर ने उनका किरदार निभाया था। राकेश ओमप्रकाश मेहरा पिक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ राजीव टंडन ने कहा, हम अपनी फिल्म के जरिए मिल्खा जी की कहानी बताने के लिए उनकी सराहना करना चाहते और उन्हें अपनी तरफ से कुछ खास देना चाहते थे। हमने बहुत लंबे समय तक ऐसी किसी खास चीज की खोज की। फिर हमें आखिर में एक विशेष 1 रुपए का नोट मिला, जो 1958 में छपा था।

रोम ओलंपिक में काश पीछे मुड़कर न देखा होता!
जब भी मिल्खा सिंह का जिक्र होता है रोम ओलंपिक में उनके पदक से चूकने का जिक्र जरूर होता है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ‘मेरी आदत थी कि मैं हर दौड़ में एक दफा पीछे मुड़कर देखता था। रोम ओलंपिक में दौड़ बहुत नजदीकी थी और मैंने जबरदस्त ढंग से शुरुआत की। हालांकि, मैंने एक दफा पीछे मुड़कर देखा और शायद यहीं मैं चूक गया। इस दौड़ में कांस्य पदक विजेता का समय 45.5 था और मिल्खा ने 45.6 सेकंड में दौड़ पूरी की थी।

बेटा जीव मिल्खा सिंह हैं गोल्फर
मिल्खा सिंह के बेटे जीव मिल्खा सिंह अंतरराष्ट्रीय स्तर के जाने-माने गोल्फर हैं। जीव ने दो बार एशियन टूर ऑर्डर ऑफ मेरिट जीता है। उन्होंने साल 2006 और 2008 में यह उपलब्धि हासिल की थी। दो बार इस खिताब को जीतने वाले जीव भारत के एकमात्र गोल्फर हैं। वह यूरोपियन टूर, जापान टूर और एशियन टूर में खिताब भी जीत चुके हैं।

मिल्खा तब दौड़ता थे जब पैरों में जूते नहीं होते थे
फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह ने कहा था- नहीं जानता था कि ओलिंपिक गेम्स होते क्या हैं, एशियन गेम्स और वन हंड्रेड मीटर और फोर हंड्रेड मीटर रेस क्या होती है? मिल्खा सिंह तब दौड़ता था जब पैरों में जूते नहीं होते थे। न ही ट्रैक सूट होता था। न कोचेस थे और न ही स्टेडियम। 125 करोड़ है देश की आबादी। मुझे दुख इस बात का है कि अब तलक कोई दूसरा मिल्खा सिंह पैदा नहीं हो सका। उन्होंने कहा था कि मैं 90 साल का हो गया हूं, दिल में बस एक ही ख्वाहिश है कोई देश के लिए गोल्ड मेडल एथलेटिक्स में जीते। ओलंपिक में तिरंगा लहराए। नेशनल एंथम बजे। अपने हुनर से कई खिताब जीतने वाले मिल्खा सिंह ने दिल की ये टीस रोटरी क्लब के इवेंट ब्लेसिंग में शेयर की। तीन दिवसीय कार्यक्रम के अंतिम दिन वे बतौर स्पेशल गेस्ट पहुंचे थे।

आर्मी से 3 बार हुए रिजेक्ट
उन्होंने कहा था कि मुझे आर्मी से 3 बार रिजेक्ट किया गया। मेरी हाइट ठीक थी, दौड़ा भी। मेडिकल टेस्ट भी पास किया, मगर मुझे रिजेक्ट कर दिया गया। उस दौर में भी पैसे और सिफारिश चलती थी। ये सब मेरे पास नहीं था। लिहाजा मैं 3 बार रिजेक्ट हुआ। मगर ये भी सच है कि मैं इसके बाद जो कुछ बना वो आर्मी के कारण ही बना। वहां स्पोर्ट्स की ट्रेनिंग मिली, कोच मिले। तब कहीं जाकर मैं ये सब कर पाया।

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