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दलितों के लिए ममता बनाएंगी बंगाल में देश का पहला ‘दलित साहित्य अकादमी’

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी चुनावों को देखते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने दलित समुदाय के लोगों को लुभाने के लिए बंगाल में देश का पहले ‘दलित साहित्य अकादमी’ खुलने की घोषणा कर बंगाल की राजनीति को एक नई दिशा की ओर मोड़ दिया है। अब वो अपने आपको को देश भर के दलितों की हितैषी के रूप में पेश कर रहीं हैं। उन्होंने बंगाल में दलित साहित्य अकादमी के गठन का एलान किया है। इसको लेकर भी लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं, कोई इसे बढ़िया पहल बता रहा है तो कोई दलित वोटों को पाने की रणनीति बता रहा है। इन सबके बावजूद इतना जरूर है कि पश्चिम बंगाल इस तरह की अकादमी बनाने वाला देश का पहला राज्य जरूर बन गया है।

देश में अभी तक किसी मुख्यमंत्री ने नहीं किया किसी अकादमी का गठन

देश के राज्यों की राजनीति पर नजर डालें तो यहां कई राज्यों में दलित मुख्यमंत्री रहे हैं लेकिन अब तक किसी राज्य में ऐसी किसी अकादमी का गठन नहीं किया गया। यूपी, बिहार जैसे राज्यों में दलित मुख्यमंत्री राज कर चुके हैं मगर उनकी ओर से इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया। उधर ममता इससे पहले अपने राज्य में आदिवासी अकादमी के गठन का भी एलान कर चुकी हैं।

साल 2021 में होने हैं बंगाल विधानसभा चुनाव

राजनीति के जानकारों का कहना है कि ममता की निगाहें अगले साल होने वाले अहम विधानसभा चुनावों पर हैं। वो इस बार दलितों और आदिवासियों को अपने पाले में करने में लगी हुई हैं। हालांकि ममता बनर्जी की दलील है कि दलित साहित्य भी बांग्ला साहित्य का हिस्सा है। पहले राज्य में एक आदिवासी अकादमी थी लेकिन दलित साहित्य को समुचित स्वरूप में बढ़ावा देने के लिए ही सरकार की इस नई अकादमी के गठन का फैसला किया गया। उनका कहना है कि नई अकादमी के तहत दलित के अलावा आदिवासी, नमोशुद्र, डोम, बागदी, बाउरी और मांझी समेत अनुसूचित जनजाति में शामिल तमाम जातियों के साहित्य को बढ़ावा दिया जाएगा।

मनोरंजन ब्यापारी बने दलित साहित्य अकादमी के अध्यक्ष

सीएम ममता बनर्जी ने इसी सप्ताह पश्चिम बंगाल में देश की पहली दलित साहित्य अकादमी के गठन का एलान किया। सड़क से साहित्य के शिखर तक पहुंचने वाले मशहूर दलित लेखक मनोरंजन ब्यापारी को इस 14 सदस्यीय अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया है। उनका कहना था कि आदिवासियों, पिछड़ों और समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों की भाषा को बढ़ावा देना ही इस अकादमी के गठन का मकसद है। बांग्ला भाषा पर दलित भाषाओं का काफी असर है।

राजनीति दलों में बयानबाजी

चुनाव से पहले ममता बनर्जी के अकादमी के गठन की घोषणा पर बीजेपी, कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल बयानबाजी करने लगे हैं। बीजेपी इसे चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया फैसला क़रार दे रही है तो वहीं कांग्रेस भी इसे सियासी कदम बता रही है। हालांकि कांग्रेस का कहना है कि यदि दलितों को ध्यान में रखकर ये काम किया जा रहा है तो ठीक है मगर ये कहीं चुनावी वायदे की तरह ही न हो। इसका ध्यान रखा जाना चाहिए।

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