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कोरोना संक्रमण के बीच पंचायत चुनावों को लेकर उत्तर प्रदेश में बढ़ने लगी सरगर्मी

लखनऊ: दिसंबर महीने में उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म हो रहा है। चुनाव आयोग द्वारा पंचायत चुनाव के लिए निर्वाचक नामावली पुनरीक्षण कार्यक्रम शुरू करने की कवायद शुरू कर दी है। हालाकि प्रदेश में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के लिए भले ही अभी तक कोई अधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन गांवों में पंचायत चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी धीरे-धीरे बढ़नी शुरू हो गई है।

प्रदेश में होने वालें आगामी पंचायत चुनावों को देखते हुए गांवों की राजनीति में प्रधानों के खिलाफ उनके संभावित प्रत्याशियों ने जोड़ तोड़ की आजमाईश शुरू कर दी है। वहीं गांवों में ग्रामीणों (मतदाताओं) का मान-सम्मान शुरू हो गया है। इस बीच जनसंख्या नियंत्रण संबंधी कानून लागू होने की स्थिति में चुनावों में होने वाली दावेदारी को लेकर भी चर्चाएं और बहसबाजी आम हैं।

मतदाताओं को रिझाने से सरे प्रयत्न कर रहें हैं प्रत्याशी

ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य व जिला पंचायत सदस्य पद के लिए होने वाले पंचायत चुनाव को लेकर गांवों में संभावित उम्मीदवारों के बीच अभी से राजनीति की शतरंज पर शह-मात के खेल की बिसात बिछनी शुरू हो गई है। एक तरफ सत्ता पक्ष से जुड़े संभावित उम्मीदवार थानों से लेकर ब्लाक, तहसील तक अपने सुरक्षित मतदाताओं की पैरवी में जी जान से लगे हैं। वहीं विपक्षी उम्मीदवार भी पीछे नहीं है।

संभावित उम्मीदवार बीते समय में किसी वजह से नाराज मतदाताओं के मान मनौवल में जुटे दिखाई दे रहे हैं। चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे प्रत्याशी ग्रामीणों के सुख-दुख के हर कार्यक्रम में बिना बुलाए ही पहुंचने लगे हैं और उनका सहयोग कर रहे हैं। सरकार द्वारा चुनाव को लेकर प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण के बिंदुओं पर भी मंथन शुरू हो गया है कि दो से अधिक बच्चे वाले लोग चुनाव लड़ सकेंगे या नहीं।

 

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