देश में मंडराया बिजली का संकट , कोयले की कमी से बिजली उत्पादन प्रभावित

विदेशों से आने वाले कोयले की कीमतें बढ़ीं

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जहां देश एक तरफ कोरोना से ऊभर नहीं पाया वही दूसरी तरफ कोयले और बिजली को लेकर संकट के बादल मंडराते नजर आ रहे है. दरअसल कोयले का संकट होने का सीधा-सीधा असर बिजली के उत्पादन पर पड़ेगा, क्योंकि देश में ज्यादातर बिजली कोयले से ही बनाई जाती है. जहां देश में कोविड की दूसरी लहर के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार आया है. इससे बिजली की खपत बढ़ गई है. इस वक्त हर दिन 4 बिलियन यूनिट्स की खपत हो रही है और 65% से 70% तक बिजली कि खपत बढ गई जिसकी आपूर्ति कोयले से होती है।

2019 में अगस्त-सितंबर में बिजली की खपत 106.6 बिलियन यूनिट्स हुई थी, जबकि इस साल अगस्त-सितंबर में 124.2 बीयू की खपत हुई. इसी दौरान कोयले से बिजली का उत्पादन 2019 के 61.91% से बढ़कर 66.35% हो गया. अगस्त-सितंबर 2019 की तुलना में इस साल के इन्हीं दो महीनों में कोयले की खपत 18% बढ़ गया. मार्च 2021 में इंडोनेशियाई कोल की कीमत 60 डॉलर प्रति टन थी जो सितंबर-अक्टूबर में बढ़कर 160 डॉलर प्रति टन हो गई. इससे कोयले के आयात में कमी आई है. 2019 कि तुलना में आयातित कोयले से बिजली के उत्पादन में 43.6% की कमी आई है जिससे अप्रैल से सितंबर 2021 के बीच घरेलू कोयले पर 17.4 मीट्रिक टन की एक्स्ट्रा डिमांड बढ़ी है इस कमेटी ने 9 अक्टूबर को मीटिंग की थी. इसमें नोट किया गया कि 7 अक्टूबर को कोल इंडिया ने एक दिन में 1.501 मीट्रिक टन कोयले को डिस्पैच किया है, जिससे खपत और सप्लाई के अंतर में कमी आ गई है. अगले तीन दिन में इस डिस्पैच को 1.6 मीट्रिक टन तक पहुंचाने का टारगेट रखा गया है लेकिन ये संकट आया क्यों तो इसके कुछ कारण हैं अर्थव्यवस्था में सुधार आते ही बिजली की मांग बढ़ना, सितंबर में कोयला खदानों के आसपास ज्यादा बारिश होने से कोयले का उत्पादन प्रभावित हुआ है साथ ही विदेशों से आने वाले कोयले की कीमतें बढ़ीं. इससे घरेलू कोयले पर निर्भरता बढ़ गई. और एक यह भी बड़ा कारण है कि मॉनसून की शुरुआत से पहले कोयले का स्टॉक नहीं रखा गया हालांकि, ऊर्जा मंत्रालय का दावा है कि जल्द ही इस संकट को दूर कर लिया जाएगा।

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